Poetry

परवाज़

  चाँद रखना धीरे से क़दम कुछ लोग अभी ही सोए हैं कुर्बान करके अपनी ही नींद जिन्होंने लाखों ख़्वाब बोए हैं उस रात के शोर में तुमने क्या ख़ामोशी की आवाज़ सुनी? कफ़स जो सारे बिखर गए हैं क्या उनकी अनसुनी फ़रियाद सुनी? ऐ चाँद तू अब ग़ुरूर न कर ये रात अब तेरी… Continue reading परवाज़