Poetry

चार धाम में गिरे ये चित चौरासी बार हैं।

दूध पर जमी मलाई का भगौना भर गया, आज माँ ने पिन्नियाँ बनानी हैं। घर में घी जो बन रहा, बने बिना बिखर गया, आज चूल्हे आग न लगानी है। साग जो बिलखती माँ के खून से निखर गया, आज आँसू से फसल उगानी है। बेतहाशा बद तमीज़ बच्चे जो हैं पल रहे, कंठ कड़वा,… Continue reading चार धाम में गिरे ये चित चौरासी बार हैं।

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इंसान बन सकोगे तुम ?

क्या अपना सकोगे तुम सूखे पेड़ से लटकी हुइ शाखों को रंडी खानो में भिखरे हुए बालों को, और गर्भ को, और चेतनाओं को, और उस दिल को, और उस हारे हुए जिस्म को क्या अपना सकोगे तुम । . क्या संवार सकोगे तुम उन भिखरे हुए बालों को, लटकी हुइ खालों को, या तने… Continue reading इंसान बन सकोगे तुम ?

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धरती, धर्म और भूख : एक संकलन।

नभ में चहका लख लाल देख लिखता बहता कंकाल देख आप ही संहारता आहिस्ता आहिस्ता हृदय निकाल फेंक आहिस्ते हृदय निकाल फेंक । मायूस नैन जर्जर काया ना आवे नजर किसी जमघट में, नह तृप्त करे कोहि मोह माया, ख्वाहिश तमाम रस्ते अनेक हर ख्वाहिश हिस्से एकहई स्वर हर ख्वाहिश हिस्से घाट एक । नह… Continue reading धरती, धर्म और भूख : एक संकलन।