Poetry

चार धाम में गिरे ये चित चौरासी बार हैं।

दूध पर जमी मलाई का भगौना भर गया, आज माँ ने पिन्नियाँ बनानी हैं। घर में घी जो बन रहा, बने बिना बिखर गया, आज चूल्हे आग न लगानी है। साग जो बिलखती माँ के खून से निखर गया, आज आँसू से फसल उगानी है। बेतहाशा बद तमीज़ बच्चे जो हैं पल रहे, कंठ कड़वा,… Continue reading चार धाम में गिरे ये चित चौरासी बार हैं।