Short stories

बीबी फ़िज़ा और नामहरम कंडक्टर

यूँ तो 507 का रोज़ ही बेमन से इंतज़ार किया जाता है, पर आज एक दिलचस्प वाकया हुआ। हमेशा की तरह कॉलेज से निकलते-निकलते 9 बज गए और फ़िज़ा जामिया बस स्टैंड पर हाज़िरी देने पहुँच गई, वैसे तो जनाब हर दफ़ा साथ होते हैं पर आज उन्हें भी जल्दी जाना था, तो वह अकेली ही बस के लिए पलकें बिछाए रुकी रही। अब 507 वक़्त की पाबंद तो है नहीं, 5-10 मिनट तो कहीं नहीं गए पर किस्मत देखिए बेचारी की, 9:30 पर बस आई और आई भी 20 रु के टिकट वाली एसी बस! यह देख फ़िज़ा का जो खून खौला, उसे शब्दों  में बयान करना मुश्किल है। अजी गुस्सा भी क्यों न आए, अपनी दरियादिली की वजह से हफ़्ता जैसे ही अपने ख़ात्मे के करीब पहुँचता, फ़िज़ा के बटुवे में 30-40 रुपये ही बचते। आज भी यही आलम था, गिन के 30 रुपये बचे थे बटुवे में, अगर 20 रुपये का एसी बस का टिकट लिया तो मेट्रो से उतर कर ऑटो वाले को क्या फ़ीकी मुस्कान देगी। इस वक़्त अकेले इंतज़ार करना अक्लमंदी का काम न था। तमतमाता हुआ चेहरा ले कर बस में चढ़ी और कंडक्टर पर बरस पड़ी, “क्यों साहब, आज आधा घंटा इंतज़ार कराया, ख़ुदा के लिए कभी तो वक़्त पर आ जायें ”। सुना तो ऐसे रही थी कि सुनने वाला नामहरम बस का कंडक्टर नहीं उसका कोई सगा हो जिससे शिकवे शिकायतें करने का हक़ पैदा होते ही मिल गया हो। वह बेचारा भी बीबी फ़िज़ा की बातों को सब्र से सुनकर बोला , “जी वो बटला हाउस के पास बस ख़राब हो गई थी।” फ़िज़ा के मन में तो था कि तुनक कर कहे कि खुद क्यों नहीं ख़राब हो गए, पर उसने अपने अल्फाज़ों को अंदर ही रहने दिया और 20 रुपये थमा कर अपना टिकट लेकर सीट पर जाकर बैठ गई। अभी बैठी ही थी कि पीछे से एक आवाज़ आई, “मैडम, रुपये ” पहले तो फ़िज़ा को समझ नहीं आया कि मुआ कौन से रुपयों की बात कर रहा है, उसने पीछे मुड़ कर देखा तो कंडक्टर 5 रुपये का सिक्का लिए खड़ा था, पूछने पर भोली-सी शक्ल बना कर बोला “वो आपको आधा घंटा इंतज़ार कराया और गुस्सा दिलाया इसलिए आपका टिकट कॉलेज से नहीं, न्यू फ्रेंड्स कालोनी से बनाया है, ये लीजिये आपके 5 रुपए”, यह कह कर वह आगे ड्राइवर के पास गया और कहा, “भाई, ज़रा एसी का तापमान कम कर, बस में ठंडक बढ़ानी है।”

~फ़िज़ा

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